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एप्स्टीन आइलैंड के बच्चों के हत्यारे; ग़ज़ा पट्टी से मिनाब तक

सभ्यता का पतन जो आज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बच्चों की हत्या पर गर्व करता है

एप्स्टीन आइलैंड के बच्चों के हत्यारे; ग़ज़ा पट्टी से मिनाब तक

Voice_of_Iran के नए इश्यू का एडिटोरियल पेश है, जिसका शीर्षक हैः एप्स्टीन आइलैंड के बच्चों के हत्यारे; ग़ज़ा पट्टी से मिनाब तक

वियतनाम युद्ध के समय से अमरीका के हाथों सबसे बड़ी त्रासदी और दुनिया के इतिहास में किसी स्कूल में लड़कियों का सबसे बड़ा नरसंहार।” ये वे वाक्य हैं जो एक ब्रिटिश पॉलिटिकल हस्ती ने मिनाब के "हयात तैयबा" गर्ल्स स्कूल पर बमबारी के बारे में कहे हैं।

 

हत्या और अपराध की यह मुहिम इतनी साफ़ और ज़ाहिर है कि वेस्टर्न सिविलाइज़ेशन ने भी इस पर प्रतिक्रिया दिखाई है। अगर दुश्मन नियमों के साथ इस मामले काम कर रहे होते, तो सैद्धांतिक रूप से वे आम लोगों को नुकसान नहीं पहुँचा सकते, लड़कियों के स्कूल को टारगेट करना तो दूर की बात है, जिसे किसी भी धर्म या पंथ का कोई भी इंसान बर्दाश्त नहीं करेगा।

 

इस करतूत पर इंसानी भावनाएं और इंसानी स्वभाव का बेज़ार होना, घटना का एक पहलू है। घटना का दूसरा पहलू यह है कि जिस सभ्यता को इंसानियत के लिए अच्छाइयों और भौतिक और आध्यात्मिक संभावनाओं का नमूना मुहैया करना था, वह अब इतनी घिनौनी और एक सिस्टमैटिक नरसंहार की मशीन बन गई है।

 

यह नया उपनिवेशिक और ग़ुलामी वाला कल्चर न सिर्फ़ उसी क्लासिकल उपनिवेशकि सिस्टम का क्रम है, बल्कि साइंस और टेक्नोलॉजी से लैस होकर, क्रूरता की नई हदें पार कर चुका है कि जिसके बारे में 18वीं और 19वीं सदी के क्लासिकल उपनिवेशवादी सोच भी नहीं सकते थे। एक ऐसा सिस्टम जो साइंस और टेक्नोलॉजी के सहारे अपनी टारगेटेड किलिंग पर गर्व करता है। उसका गर्व इस बात पर है कि यह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इंसानों, लड़कियों, औरतों और बच्चों की लोकेशन को सही-सही पहचानकर अपनी वहशी करतूतों का निशाना बनाता है और उनका ख़ून ज़मीन पर बहाता है। यह, आम लोगों, औरतों और बच्चों को लड़ाके बताकर उनके ख़ून बहाए जाने को सही ठहराता है।

 

हैरत की बात यह है कि दुनिया के बुद्धिजीवी और मीडिया के क्षेत्र में जिन का दबदबा है, वे भी अपने व्यवहार, बोलचाल और यहाँ तक कि चुप्पी से इस करतूत की पुष्टि करते हैं। जिस व्यक्ति के बयानों का हवाला शुरुआत की लाइनों में दिया गया है, वह अपने बयान के दूसरे हिस्से में कहता है कि सोचिए अगर इसका उल्टा होता और ईरानियों या फ़िलिस्तीनियों ने 150 लोगों का यह नरसंहार किया होता, तो उस वक़्त रिएक्शन क्या होते? जिन लोगों ने “हयात तैयबा” गर्ल्स स्कूल का जुर्म किया और उसे इंसानी दख़लअंदाज़ी के सिर थोप दिया, ये वही लोग हैं जिन्होंने इस से पहले ग़ज़ा पट्टी के अस्पतालों और स्कूलों में भी यही करतूत अंजाम दी थी।

 

इस वहशी, बच्चों की हत्यारी सभ्यता का आसमान दुनिया में हर जगह एक ही रंग का है। नरसंहार का यह क्रम रुकने वाला नहीं। ज़मीन के किसी भी हिस्से के रहने वाले जो एप्स्टीन के द्वीप पर बच्चों के शोषणकर्ता और बच्चों के हत्यारे सरग़नाओं के आगे झुकने का इरादा नहीं रखते, वे उनके निशाने पर आ जाएंगे। इसका एक ही रास्ता है और वह ताक़तवर बनना है। ज़्यादा ताक़तवर बनना और ताक़त की ज़बान में बोलना। ग़ज़ा पट्टी में हुए नस्ली सफ़ाए और दक्षिणी ईरान में ईरानी लड़कियों की तस्वीरें, ये सभी इन बच्चों के हत्यारों की करतूतों का जीता-जागता सुबूत हैं।

Mar. 5, 2026